Sunday, May 16, 2021

12th के चैप्टर कड़बक का सारे प्रश्नों के उत्तर , B.S.E.B. 12th के कड़बक चैप्टर के सारे प्रश्नों के उत्तर.

 कडबक B.S.E.B. 12th के हिन्दी के ANSWER  बिहार बोर्ड के हिंदी का question answer

1. उत्तर-कवि नेअपनी एक आँख की तुलना दपपण सेइसललए की हैक्योंकक दपपण स्िच्छ ि ननर्पल होता है, उसर्ेंर्नुष्य की िैसी ही प्रनतछाया

ददखती हैजैसा िह िास्ति र्ेंहोता है। कवि स्ियंको दपपण के सर्ान स्िच्छ ि ननर्पल भािों सेओत-प्रोत र्ानता है। उसकेहृदय र्ेंजरा-सा

भी कृत्रिर्ता नहीं है। उसके इन ननर्पल भािों के कारण ही बडे-बडेरूपिान लोग उसके चरण पकडकर लालसा के साथ उसके र्ुख की ओर

ननहारतेहैं।

2. उत्तर-अपनी कविताओंर्ेंकवि जायसी नेकलंक, काँच और कं चन आदद शब्दों का प्रयोग ककया है। इन शब्दों की कविता र्ेंअपनी अलग￾अलग विशेषताएँहैं। कवि नेइन शब्दों केर्ाध्यर् सेअपनेविचारों को अलभव्यक्क्त देनेका कायपककया है। कलन्क का अथप कोइला, कान्च 

का अथप कच्चा धातुएिर् कन्चन क अथप सोना से है।

3. उत्तर-र्हाकवि र्ललक र्ुहम्र्द जायसी अपनी कुरूपता और एक आँख सेअंधेहोनेपर शोक प्रकट नहींकरतेहैंबक्कक आत्र्विश्िास केसाथ

अपनी काव्य प्रनतभा केबल पर लोकदहत की बातेंकरतेहैं। प्राकृनतक प्रतीकों द्िारा जीिन र्ेंगुण की र्हत्ता की विशेषताओंका िणपन करते

हैं।

क्जस प्रकार चन्रर्ा कालेधब्बेकेकारण कलंककत तो हो गया ककन्तुअपनी प्रभायुक्त आभा सेसारेजग को आलोककत करता है।

अत: उसका दोष गुण केआगेओझल हो जाता है।

क्जस प्रकार त्रबना आम्र र्ेंर्ंजररयों या डाभ केनहींआनेपर सुबास नहींपैदा होता है, चाहेसागर का खारापन उसकेगुणहीनता का

द्योतक है। सुर्ेरू-पिपत की यश गाथा भी लशि-त्रिशूल के स्पशपत्रबना ननरथपक है। घररया र्ेंतपाए त्रबना सोना र्ेंननखार नहींआता हैठीक

उसी प्रकार कवि का जीिन भी नेिहीनता के कारण दोष-भाि उत्पन्न तो करता हैककन्तुउसकी काव्य-प्रनतभा के आगेसबकुछ गौण पड

जाता है।

कहनेका तात्पयपयह हैकक कवि का नेि नक्षिों केबीच चर्कतेशुक्र तारा की तरह है। क्जसकेकाव्य का श्रिण कर सभी जन र्ोदहत हो जाते

हैं। क्जस प्रकार अथाह गहराई और असीर् आकार केकारण सर्ुर की र्हत्ता है। चन्रर्ा अपनी प्रभायुक्त आभा केललए सुखदायी है। सुर्ेरू

पिपत लशि-त्रिशूल द्िारा आहत होकर स्िणपर्यी रूप को ग्रहण कर ललया है। आर् भी डाभ का रूप पाकर सुिालसत और सर्धुर हो गया है।

घररया र्ेंतपकर कच्चा सोना भी चर्कतेसोनेका रूप पा ललया है।

क्जस प्रकार दपपण ननर्पल और स्िच्छ होता है-जैसी क्जसकी छवि होती है-िैसा ही प्रनतत्रबम्ब दृक्ष्टगत होता है। ठीक उसी प्रकार

कवि का व्यक्क्तत्ि है। कवि का हृदय स्िच्छ और ननर्पल है। उसकी कुरूपता और एक आँख के अंधेपन सेकोई प्रभाि नहींपडनेिाला। िह

अपनेलोक र्ंगलकारी काव्य-सजृ नकार सारेजग को र्ंगलर्य बना ददया है। इसी कारण रूपिान भी उसकी प्रशंसा करतेहैंऔर शीश निाते

हैं। उपरोक्त प्रतीकों केर्ाध्यर् सेकवि नेअपनेआत्र्विश्िास का सटीकर चचिण अपनी कविताओंकेद्िारा ककया है।

4. उत्तर-कवि र्ललक र्ुहम्र्द जायसी नेअपनी स्र्नृत के रक्षाथपजो इच्छा प्रकट की है, उसका िणपन अपनी कविताओंर्ेंककया है।कवि का

कहना हैकक र्ैंनेजान-बूझकर संगीतर्य काव्य की रचना की हैताकक इस प्रबंध केरूप र्ेंसंसार र्ेंर्ेरी स्र्नृत बरकरार रहे। इस काव्य-कृनत

र्ेंिर्णपत प्रगाढ़ प्रेर् सिपथा नयनों की अश्रुधारा सेलसंचचत हैयानन कदठन विरह प्रधान काव्य है।दसू रेशब्दों र्ेंजायसी नेउस कारण का

उकलेख ककया हैक्जससेप्रेररत होकर उन्होंनेलौककक कथा का आध्याक्त्र्क विरह और कठोर सूफी साधना केलसद्धान्तों सेपररपुष्ट ककया

है। इसका , कारण उनकी लोकै षणा है। उनकी हाददपक इच्छा हैकक संसार र्ेंउनकी र्त्ृयुके बाद उनकी कीत्ती नष्ट न हो। अगर िह के िल

लौककक कथा-र्ाि ललखतेतो उससेउनकी कानतपचचर स्थायी नहीं होती। अपनी कीनतपचचर स्थायी करनेके ललए ही उन्होंनेपद्र्ािती की

लौककक कथा को सूफी साधना का आध्याक्त्र्क पष्ृठभूलर् पर प्रनतक्ष्ठत ककया है। लोकै षणा भी र्नुष्य की सबसेप्रर्ुख िवृत्त है।

5. उत्तर प्रस्ततु पंक्क्तयाँकडबक (1) सेउद्धतृ की गयी है। इस कविता के रचनयता र्ललक र्ुहम्र्द जायसी हैं। इन पंक्क्तयों केद्िारा कवि ने

अपनेविचारों को प्रकट करनेका कार् ककया है। क्जस प्रकार आर् र्ेंनुकीली डाभे(कोयली) नहींननकलती तबतक उसर्ेंसुगंध नहींआता

यानन आर् र्ेंसुगन्ध आनेकेललए डाभ युक्त र्ंजररयों का ननकलना जरूरी है। डाभ केकारण आर् की खुशबूबढ़ जाती है, ठीक उसी प्रकार

गुण केबल पर व्यक्क्त सर्ाज र्ेंआदर पानेका हकदार बन जाता है। उसकी गुणित्ता उसके व्यक्क्तत्ि र्ेंननखार ला देती है।

6. उत्तर-कवििर जायसी कहतेहैंकक कवि र्ुहम्र्द नेअथापत्र्ैंनेयह काव्य रचकर सुनाया है। इस काव्य को क्जसनेभी सुना हैउसी को प्रेर् की

पीडा का अनुभि हुआ है। र्ैंनेइस कथा को रक्त रूपी लेई के द्िारा जोडा हैऔर इसकी गाढ़ी प्रीनत को आँसुओंसेलभगोया है। यही सोचकर

र्ैंनेइस ग्रन्थ का ननर्ापण ककया हैकक जगत र्ेंकदाचचत, र्ेरी यही ननशानी शेष बची रह जाएगी।

7. उत्तर-‘र्ुहम्र्द यदह कत्रब जोरर सुनािा’ र्ें‘जोरर’ शब्द का प्रयोग कवि ने‘रचकर’ अथपर्ेंककया हैअथापत्र्ैंनेयह काव्य रचकर सुनाया है।

कवि यह कहकर इस तथ्य को उजागर करना चाहता हैकक र्ैंनेरत्नसेन, पद्र्ािती आदद क्जन पािों को लेकर अपनेग्रन्थ की रचना की है, 

उनका िास्ति र्ेंकोई अक्स्तत्ि नहींथा, अवपतुउनकी कहानी र्ाि प्रचललत रही है।

8. उत्तर-दसू रेकडबक र्ेंकवि नेइस तथ्य को उजागर ककया हैकक उसनेरत्नसेन, पद्र्ािती आदद क्जन पािों को लेकर अपनेग्रन्थ की रचना

की हैउनका िास्ति र्ेंकोई अक्स्तत्ि नहींथा, अवपतुउनकी कहानी र्ाि प्रचललत रही है। परन्तुइस काव्य को क्जसनेभी सुना हैउसी को

प्रेर् की पीडा का अनुभि हुआ है। कवि नेइस कथा को रक्त-रूपी लेई केद्िारा जोडा हैऔर इसकी गाढ़ी प्रीनत को आँसुओंसेलभगोया है। कवि

नेइस काव्य की रचना इसललए की क्योंकक जगत र्ेंउसकी यही ननशानी शेष बची रह जाएगी। कवि यह चाहता हैकक इस कथा को पढ़कर

उसेभी याद कर ललया जाए।

9. उत्तर-प्रस्तुत पंक्क्तयाँजायसी ललर्खत कडबक केद्वितीय भाग सेउद्धत की गयी है। उपरोक्त पंक्क्तयों र्ेंकवि का कहना हैकक क्जस प्रकार

पुष्प अपनेनश्िर शरीर का त्याग कर देता हैककन्तुउसकी सुगक्न्धत धरती पर पररव्याप्त रहती है, ठीक उसी प्रकार र्हान व्यक्क्त भी इस

धार् पर अितररत होकर अपनी कीनतपपताका सदा केललए इस भिन र्ेंफहरा जातेहैं। पुष्प सुगन्ध सदृश्य यशस्िी लोगों की भी कीनतपयाँ

विनष्ट नहींहोती। बक्कक युग-युगान्तर उनकी लोक दहतकारी भािनाएँजन-जन केकं ठ र्ेंविराजर्ान रहती है।

कड़बक भाषा की बात

1. ननम्नललर्खत शब्दों के तीन-तीन पयापयिाची शब्द ललखें

✓ नैन आँख, नेि, चक्षु, दृक्ष्ट, लोचन, र्खया, अक्षक्ष।

✓ आम रसाल, अंब, आंब, आम्र।

✓ चन्द्रमा शलश, चाँद, अंशुर्ान, चन्दा, चंदर, चंद।।

✓ रक्त खून, रूचधर, लहू, लोदहत, शोवषत।

✓ राजा नरेश, नपृ , नपृ नत, प्रजापनत, बादशाह, भूपनत, भूप।

✓ फूल सुगर्, सुकुर्, पुष्प, गुल।

2. उत्तर-पहलेकडबक र्ेंकवि नेचाँद, सूक, अम्ब, सर्ुर, सुर्ेरू, घरी, दपपण आदद उपर्ानों का प्रयोग अपनेललए ककए हैं।

3. ननम्नललर्खत शब्दों केर्ानक रूप ललखें

✓ शब्द – र्ानक रूप शब्द – र्ानक रूप शब्द – र्ानक रूप

❖ दरपन – दपपण ननरर्ल – ननर्पल प्रेर् – पेर्

❖ पानन – पानी नखत – नख रकत – रक्त

❖ कीरनत – कीनतप

4. उत्तर-जायसी केदोनों कडबकों र्ेंशांत रस का प्रयोग हुआ है। दोनों कडबकों र्ेंर्ाधुयपगुण है।

5. उत्तर-संज्ञा पद-नयन, कवि, र्ुहम्र्द, चाँद, जंग, विचध, अितार, सूक, नख, अम्ब, डाभ, . सुगंध, सर्ुर, पानी, सुर्ेरु, नतरसूल, 

कं चन, चगरर, आकाश, धरी, काँच, कं चन, दरपन, पाउ, र्ुख।

6. उत्तर-यह, सो, अस, यह, र्कु, सो, कहाँ, अब, अस, कँ ह, जेई, कोई, जस, कई, जरा, जो।

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